वक़्त और दुनिया से परे !

आपका हाथ मेरे हाथों में है
अब कहाँ परवाह मुझे दुनिया की !

ज़िन्दगी तुम मेरी हो
तुम्ही लाते हो ताज़गी।

साथ जब तुम हो कहाँ हूँ मैं अपने आप की
तुम्हारे प्यार ने बिखरी हरयाली मुज बंजर पर
अब तोह बस एक ही मक़सद, एक ही दुआ, मिलने की।

सब्दों से हुआ सिलसिला शुरू, कभी न होगा ख़त्म ये
प्यार ही प्यार बेशुमार, जैसे हो वक़्त और दुनिया से परे ।

हर खत बुनता सपने, कर लब्ज़ बिखेरता चाह
कारवां कभी ख़त्म न हो, यही है मंशा आपकी।

इक न्यूनता से गुज़रे दोनों, बस शुन्य ही था पास
भरा है दोनों से जीवन, सब कुछ हो गया है ख़ास।

तामीर किया है अपना जीवन बस आपके साथ
हर मुश्किल, ख़ुशी हो या ग़म अब गुज़रे हाथों में हाथ।

 

मैं भी तोह रूठी हूँ

कही अनकही, बोल दुःखदायी, कहा सुनी बस वोही तोह हो
थका दिमाग, सुकूं की मंशा, गुरूर अब छोड़ भी दो
मैं भी तोह रूठी हूँ, मुझे भी मनाया करो।
वो घंटों प्यार कि बातें करना, प्यार के आगे कुछ न सोचना
शब्दों से बोल और बोल से शब्दों का बदलना, कभी वो भी तोह याद करो
मैं भी तोह रूठी हूँ, मुझे भी मनाया करो।
देर रात तोह कभी उजली सुबह ख़त लिखना, मिले खतों को कई  बार पढ़ना
मेरे हर एहसास का अब मोल न आंको
मैं भी तोह रूठी हूँ, मुझे भी मनाया करो।
न खाने का होश, नींद भी है त्यागी, एक ही प्यास अब दिल मैं समायी
दरवाज़ा जो बंध कर रखा है वो तोह केवल खोल दो
मैं भी तोह रूठी हूँ, मुझे भी मनाया करो।
वो स्पर्श का अनुभव, वो आलिंगन कि मांग
मिलने का ख्वाब और हाथ थामने कि वजह तोह याद करो
मैं भी तोह रूठी हूँ, मुझे भी मनाया करो।कहते हो अक्सर, “प्रिये, बस तुम्हारा प्यार है जो बांधे रखा है हमे। ”
उन रिश्तों के धागों का कुछ तोह वास्ता रखो
मैं भी तोह रूठी हूँ, मुझे भी मनाया करो।

बिछड़ने के भय से मौका न दिया अपने आप को रूठने का अब तक
पर आज  मन कह रहा है रूठने और रूठे रहने को
न मनाओ मुझे अब यह भी जाइज़ है, शायद मेरे प्यार कि यही आज़माइश है।

 

इंतज़ार

 
 इंतज़ार
 
क्यूँ  नही आता वो लम्हा जिसका इंतज़ार है 
सदियों से उसके आने कि पुहार है
 
कब होगा मेरा सामना उससे, कब पूछ पाऊँगी वो अधूरे सवाल 
 जिन सवालों को वो मोड़ गया था 
 मेरे ही सवाल मुझही पे छोड़ गया था 
 
उस लम्हे के बाद न आयी मेरे दिल से आवाज़ 
 उन एहसासों को मुझ में दफ्न कर गया था 
 
 उस वक़्त से इस वक़्त का इंतज़ार ता उम्र रहेगा 
एक उम्मीद में कि वोह लम्हा फिर आएगा 
 
 होंगे आमने सामने मौजूद हम 
  पूछ पाऊँगी क्यूँ दिए थे वो ज़ख्म 
 
क्यूँ खेल तूने यह खेला 
 मौत भी तू किश्तों में दे चला। 


एक दस्तक


मेरे टूटे हुए दिल पे आयी एक दस्तक
एक अरसा बीत गया था , कईं साल गुज़र चुके थे।

मैंने कर दिया अनदेखा उसे , मेरे मन का ब्रह्म समझ के
कुछ दिनों बाद फिर से वही दस्तक सुनी।

किवाड़ खोली तोह देखा, उसे, त्वरित साँसे साफ़ सुनाई देती थी
अविलंभ हाथ बढ़ाते हुए कहा उसने, इंतज़ार है तुम्हारा।

अचम्भा हुआ और डर भी, विश्वास टूट चूका था पहले ही,
मेरी हिचकिचाहट पहचानी उसने।

हाथ और बढाकर कहा, थाम्ब लो,
माइने पता थे मुझे, एक ओर डर पर उसकी बाज़ुओ पर भरोसा भी।

ग़ौर से देखा और थामा उसका हाथ
“शुक्रिया, छोडूंगा नहीं कभी। “

मैंने भी मुस्कुराते कहा “पहले तुटी थी अब तोह बिखजाउंगी।