मौन ही मेरी चीख है !

दर्द से जी चीख उठा
वह लम्हा जब याद आया।तेरे शब्दों से बिखरी थी जब
कोई और किनारा न मिला तब।

उसी वक़्त आँखें मूंदी
सब्र की दीवार फिर से टूटी।

एक हाथ बढ़ा आश्रय देने
बुने रिश्तों के ताने बाने।

दिल ने ढूंढा फिर से सहारा
आँखें खोल देखा हाथ था तेरा।

असमंजस हुआ यह कैसा रिश्ता है!
जो दुःख दे वही  सहारा है!

स्वीकार किया यही है भाग्य मेरा
सुख भी तेरा दुःख भी तेरा।

6 Replies to “मौन ही मेरी चीख है !”

  1. बहुत खूब लिखती हैं आप… यूँ ही लिखते गाते रहिये….
    भावुक हैं आप तभी इतनी रस बरसती हैं आपकी रचनावों में…. शुक्रिया… यूँ ही उढेलते रहें

Leave a Reply to kiran wani Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *