Our Abode

 
Large wooden door stared at me,

The brown floor, the yellow walls, I wanted to flee.
 

Giggles, whispers and the moans,

Reminded of the time alone.
 

Entered the room I heard them louder,

Saw the mirror where we stood together.
 

All was cleaned and kept in place,

But the one thing I couldn’t face.
 

It was our bed still undone,

The creases reminded of carnal fun!
 

At times subtle or passionate,

It was love incarnate.
 

A glance at the pillow made me smile,

Tell myself it was worthwhile.
 

The bed then screamed your absence,

Locking the room, I left in your remembrance.

शृंगार (Beauty)

शृंगार (Beauty)

“मेरे सामने श्रुंगार करो” था उसका अनुरोध
उस बात पे रंग गयी, फिर रहा न कोई बोध।

मेरी ख़ुशी कि न थी कोई सीमा
उसको सौंपी थी अपनी ज़िंदगी और अपनी गरिमा।

पायल, झुमके और हार पहना उसकी पसंद से
पर वो नज़र चुरा रहा था मुझसे।

काजल लगाने जब मैंने आँखें अपनी मुंदी
अदृश्य हुआ वो, अब कहाँ उसे ढूंढ़ती ?

फिर हुआ अपने ही सामने मेरा तमाशा
उसे ढूंढ़ने कि छोड़ी मैंने आशा।

लोग पूछते जब कारण मेरी सादगी का
अधूरी मुस्कान से कहती, श्रुंगार तोह मैं कर लूं  पर डर है आँखें मुँदनेका।

 

आईना

तेरे चेहरे कि शिकन बर्दाश्त न होती
तुझे खुश रखने में मुझही को बदलती।

एक दिन हुआ आईने  से सामना मेरा
पहचान न पायी वह कौन था खड़ा

सूखे बाल, लाल आखें, होंठ फटे
साफ़ बयां कर रहे थे पिछले दिन जो कटे

गौर से देखकर मैंने पूछा उसका नाम
‘रेवती ‘ कहते ही हुई उसकी आँखें नम।

नाम भी शायद उसी ने होगा दिया
शक्ल, हस्ती और बोली वह सब बदल गया।

अपने आप को बदल कर क्या तूने पाया
आक्रोश, डर और अफ़सोस ही दिल में समाया।

लौट आ अभी भी वक़्त है
दिल कि लौ अभी भी तेज़ है।

मत मिटा अपने मन का विश्वास
हाँ, अभी भी है तू ख़ास।

शायद वो था नहीं तेरा हमसफ़र
साथ न चल पाते दोनों रहगुज़र।

ले किस्मत को हथेली पर और भर दे गुलाल
वादा है खुद से न रहेगा कोई मलाल।